साँसों की गर्मी बढ़ गयी हे
गूंजने लगी हे सिसकिया,
अब न जाने बालम क्या होगा
अभी तो मेरे होंटो को तुम्हारे होंटो ने सिर्फ छुवा है
चूम लोगे तो आलम क्या होगा
बंद आँखों से महसूस कर रही हूँ इन नजदीकियों को
आँखों खोल दूंगी तो आलम क्या होगा
मेरे चेहरे पर हाथ तुम्हारे सरके हैं तो मदहोश हो हो गयी हूँ मैं
बदन पे हाथ सरकेंगे तो तो आलम क्या होगा
सर से चूमते चूमते बाँहों तक आ गए हो
ये बाँहों का तिल अगर रोक लेगा तुम तो जानम क्या होगा
❤️❤️प्रवीन सिमरन❤️❤️
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