आज फूलो के बिस्तर पर, क्यों करवटें बदल रही हूँ मैं
महबूब की शानो को सहलाने के बदले, क्यों सलवटे गिन रही हु मैं?
ठंडी पुरवाई भी, है चांदनी रात भी,
सुर्ख है होंठ मेरे, नशे में जज्बात भी,
इक नज़र मेरी तरफ देख जरा,
किस कदर पिघल रही हूं मै,
मेरे हाथों को छोड़ो धीमे से,
छू कर अब बाहें थामो मेरी,
उतार दो ये लिबास जिसम से,
फिर करो कुछ अपने मन की,
तड़प कर जब तक आह ना निकले,
मचलते रहो मुझ संग तुम भी,
ये दर्द इश्क़ का, हाय! कितना सुकून देता है,
अब देखो कुछ कर रही हूं मै,
चूम लिया तुमने कुछ ऐसा,
बड़ी ही मचल रही हूं मै,
हाय! हाय! ये कुछ कुछ करना,
पानी में भी जल रही हूं मै।।
आज फूलों की सेज पर,
यूं करवटें बदल रही हूं मै,
तुम करो कुछ ऐसा वैसा,
इसलिए सिलवटें गिन रही हूं मै।।
उफ्फ कितना जल रही हूं मै।।
❤️❤️प्रवीन सिमरन❤️❤️
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