मौसम की तरह बदलने लगे हे लोग,
वादो से अपने मुकरने लगे है लोग।।
कैसे सजाये हम चमन फूलो का,
कालिया ही आज कल मसलने लगे है लोग।।
कैसे हिफाजत करे अब अपने अरमानो की
अपनों से ही आजकल लूटने लगे है लोग।।
अपने जख्म खुद ही सहलाये जा रही हु
नमक को मरहम समझ कर लगाए जा रही हूं।।
❤️❤️pravin simran ❤️❤️
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