चलती सुबह ढल कर रात हो आई,
देखो देखो तारों की बारात हो आई,
हया आने लगी है अब मुझको भी,
बंद कमरे में हम दोनों ये कैसी बात हो आई?
सात फेरे, सातों वचन और साक्षी है अग्नि,
तेरे लिए मै अपना हंसता जहान छोड़ आई,
चाहा तो तुमने था मुझे, मैने तो अपनाया है तुम्हे,
तेरे लिए मै सारे बंधन सारी कसमें तोड़ आई।
काश मेरी मुस्कान की वजह बनते तुम,
आंसुओ की वजह तो ये जुल्मी दुनिया हो आई,
तुमसे बहुत सी उम्मीदें है ये मेरी,
तुम तोड़ते गए, लो उम्मीदें और हो आई।
भरी आंखे छलक कर भी मुस्कुराते हैं होंठ,
दिल हजारों दफा टूटा मै फिर भी समेट लाई,
मुझे तो कभी मतलब ही ना था दुनिया के बर्ताव से,
दुख तो तब हुआ जब तेरी बातें भी औरों जैसी हो आई।
कई रोए है इस मूरत को पाने को,
जिसे मिली उसने रखी बस सजाने को,
फुरसत मिले तो सोचना जरा कभी,
मै क्या थी, क्या से क्या और क्यों हो आई।
ना बेटा काम आएगा,
बेटियां भी विदा हो जाएंगी,
ना शरीर काम आएगा,
खूबसूरती भी ढल जाएगी,
धुंधला जाएगी जब नजरें,
कपकपाने लगेंगे हाथ,
तब बस हम दोनो ही होंगे,
एक दूसरे के साथ,
झुर्रियां पड़ जाएंगी,
जब इस खूबसूरती पर,
कान भी सुनाई ना देंगे,
कपकपाती आएगी आवाज,
ना आएगी धन ये दौलत,
ना आएंगे ये बंगले काम,
उम्र भी बूढ़ी होगी जब,
पर लब होगा सदा तेरा नाम,
नींद न होगी मखमल के बिस्तर में भी,
दिन भर बैठ कर भी न होगा एक पल आराम,
तब भी बाहों में होगे तुम तो,
बीत+ती उम्र लगेगी आसान,
शादी के फेरों से, मृत्यु की अर्थी तक,
जन्मों जन्मों का होगा अपना साथ,
गिले शिकवे भूल जाना सोच कर,
हमारा कोई नही इक दूजे के बाद,
धुंधलाती नजरों में जब कोई नहीं आएगा,
तब भी तुम ही दिखोगे मुझे खुद के पास,
बहरे कान जब सुन ना सकेंगे,
तब भी तुम सुनाई दोगे मुझे मेरी जान,
हिम्मत न होगी जब लाठी से भी चलने की,
सहारा होंगे हम तब भी एक दूसरे का,
अंत में बस हम ही होंगे एक दूसरे की आखरी सांस,
ना है तुमसे पहले कोई, ना होगा कोई तेरे बाद।।
❤️❤️प्रवीन सिमरन❤️❤️
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